Sunday, August 29, 2010

खुदा का डर


डरते नहीं खुदा से हम, क्योंकि इन्सान को खुदा बनते देखा है।
डरते हैं सिर्फ इन्सान से, जब से इंसान को हैवान बनते देखा है।

क्यों बनाये हम उस शहर में अपना आशियाँ
जिस शहर को हमने शमशान बनते देखा है।

जब कभी तन्हाईयाँ से परेशां हो कर, जाते है हाला के पास,
उसे भी हर होठों का जम बनते देखा है।

ऐतबार करे कोई क्या 'राहुल' उस पर,
हर किसी शख्स को बईमान बनते देखा है।

No comments:

Post a Comment